OM SRI SAI NATHAYA NAMAH. Dear Visitor, Please Join our Forum and be a part of Sai Family to share your experiences & Sai Leelas with the whole world. JAI SAI RAM

Thursday, June 28, 2012

ॐ साईं राम


दादा साहेब खापर्डे की जीवनी के लेखक ने आगे जोड़ा है कि दादा साहेब शिरडी साईं बाबा के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद अमरावती लौट गए। लेखक ने आगे लिखा है कि डायरी में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता कि साईं बाबा से सँकरन नायर* के बारे में किए गए प्रश्नों का क्या उत्तर था। शायद यही निश्चय किया गया होगा कि इस विषय में गोपनीयता बरती जाएगी और दादा साहेब ने वचन का पालन किया होगा। यह इस बात का उदाहरण है कि डायरी से गोपनीय बातों को जानबूझ कर निकाला गया। अब जब कि दादा साहेब की मूल डायरियाँ राष्ट्रीय लेखागार के पास हैं, इन डायरियों पर आगे अनुसँधान के लिए जाँच और निरीक्षण का इँतज़ार है।


॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰� ��॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰� ��॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰� ��॰॰

*श्री के॰पी॰एस॰ मेनन, आई॰सी॰एस, जो कि सॅर सँकरन नायर के दामाद हैं, उन्होंने नवँबर १९६७ में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के द्वारा प्रकाशित उनके श्वसुर की जीवनी में कहा है कि सॅर सँकरन नायर १९१५ मे मध्य में वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य चुने गए थे( पृष्ठ ५५ ), पर उन्होंने १९१९ के जलियाँवाला बाग के हत्याकाँड के विरोध में इस्तीफा दे दिया ( पृष्ठ१०४-१०५ )। सॅर सँकरन का योग में पक्का विश्वास था ( पृष्ठ १३३ ) और उनका मस्तिष्क धीरे धीरे धर्म की ओर मुड़ गया। २४-४-१९३४ को एक कार दुर्घटना में सिर में चोट लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।


श्री वी॰बी॰खेर द्वारा लिखित प्रथम परिशिष्ट की समाप्ति


आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰


जय साईं राम
ॐ साईं राम


मार्च १९१८ की पाँचवी यात्रा-


दादा साहेब की इस अनियत शिरडी यात्रा की कोई तिथियाँ मराठी में रचित जीवनी में नहीं मिलती। तो भी अनिर्दिष्ट दिनों की इस शिरडी यात्रा का एक उद्देश्य था। दादा साहेब को होम रूल की माँग के लिए काँग्रेस शिष्टमँडल के साथ इँग्लैंड जाना था और इसी सिलसिले में वह दिल्ली आए थे। दिल्ली छोड़ने के पूर्व उन्हें सर सँकरन नायर ने बुलाया, जिन्होंने १८९७ में अमरावती में हुए काँग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता की थी, जब दादा साहेब खापर्डे स्वागत समिति के प्रमुख थे। १९१८ के आसपास सँकरन नायर भारत के वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने थे और उन्हें अपने द्वारा उठाए गए कदम के सही होने को ले कर कुछ सँशय था। अतः उन्होंने खापर्डे से अनुरोध किया कि वह उनके इस कदम के बारे में साईं महाराज से इस विषय में राय और परामर्श लें। जैसा कि जीवनी में दी गई इस बेतारीखी प्रविष्टि से पता चलता है-

" सँकरन नायर को देखा। वह मुझे देख कर बहुत खुश हुए और हम बहुत देर तक बैठ कर बातें करते रहे। उन्होंने मुझे अपनी तरफ से शिरडी के साईं महाराज के सामने यह प्रश्न रखने को कहा - क्या उनके लिए नौकरी में बने रहना उचित होगा। क्या आध्यात्मिक रूप से वह गलत जा रहे हैं। यदि हाँ तो क्या साईं महाराज उन्हें सही मार्ग पर डालेंगे। मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं साईं महाराज के समक्ष यह प्रश्न रखूँगा और उन्हें लिखूँगा कि साईं महाराज क्या कहते हैं।"


आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰


जय साईं राम
ॐ साईं राम

३० दिसँबर की प्रविष्टि-

" मैंने आज नैवेद्य अर्पित किया और पूजा की। लगभग सौ लोग नाशते के लिए आमँत्रित किए गए थे जो कि बहुत देर तक चला। असल में हम शाम ४ बजे निवृत हुए। माधवराव देशपाँडे हमेशा की तरह बहुत सहायक सिद्ध हुए। बापू साहेब बूटी का वाड़ा बहुत सुन्दर तरीके से निर्मित हो रहा है। " 


३१ दिसँबर की प्रविष्टि-


" भोजन के बाद मैं माधवराव देशपाँडे के साथ गया और मुझे बिना किसी परेशानी के लौटने की अनुमति मिल गई। मेरी पत्नि, मनु ताई, उमा, और बच्चे यहीं रहेंगे। "#

१९ मई १९१७ की चौथी यात्रा-

लोकमान्य तिलक के साथ दादा साहेब खापर्डे की यह आधे दिन की लघु यात्रा अपने नेता लोकमान्य को साईं बाबा का आशीर्वाद दिलवाने के लिए ले जाने के लिए आयोजित की गई थी। साईं लीला में इसका जो विवरण मिलता है वह लगभग पूर्ण ही है।


# पाठकों की सुविधा और निरँतरता बनाए रखने के लिए यह पँक्तियाँ पहले ही जोड़ दी गई हैं।

आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰


जय साईं राम
ॐ साईं राम


दिसँबर १९१५ में तृतीय यात्रा-


दादा साहेब खापर्डे अपने मित्र बाबा गुप्ते को मिलने थाने गए और वहाँ से मनमाड होते हुए २९ दिसँबर को शिरडी पहुँचे। श्रीमति खापर्डे और उनके परिवार के दूसरे सदस्य सीधे शिरडी पहुँचे। दादा साहेब को ३१॰१२॰ १९१५ को वापिस लौटने की अनुमति मिली, अतः वह अमरावती लौट गए परन्तु श्रीमति खापर्डे वहीं रह गई। खापर्डे शिरडी की यात्रा से बहुत खुश थे जैसा कि मराठी भाषा में लिखी गई उनकी जीवनी के इन उद्धरणों से पता चलता है जो कि अँग्रेज़ी भाषा में रूपाँतरित की गई-

२९ दिसँबर की प्रविष्टि-

" मैं प्रातः लगभग ३॰३० बजे मनमाड में जागा और कोपरगाँव जाने वाली गाड़ी में बैठा। मैंने गाड़ी में ही प्रार्थना की और दिन चढ़ने से पहले ही कोपरगाँव पहुँचा और वहाँ डा॰ देशपाँडे से मिला, जो कि कोपरगाँव के औषधालय में प्रभारी हैं। मैं उन्हें पहले से नहीं जानता था। मैंने उन्हें और उनके पुत्र को औषधालय तक अपनी सवारी में जगह दी और उन्होंने मुझे गर्म चाय की प्याली और कुछ खाने को दिया। वहाँ गहरा कोहरा था और मुझे उसमें गाड़ी चला कर कोपरगाँव से पहुँचने में सुबह के ९ बज गए। मेरी पत्नि और बच्चे वहाँ थे। 
मैं माधवराव देशपाँडे के साथ मस्जिद में गया और साईं महाराज को प्रणाम किया। उनका स्वास्थय बहुत खराब था। उन्हें खाँसी से बहुत तकलीफ हो रही थी। मैंने पूजा के समय छत्र पकड़ा। यहाँ दिन बड़ी सरलता से कट जाता है। जी॰एम॰बूटी उर्फ बापू साहेब अपने स्वामी गुरुष्टा के साथ यहाँ हैं। काका साहेब दीक्षित, बापू साहेब जोग, बाला साहेब भाटे और सभी पुराने मित्र यहाँ हैं। और मैं बहुत ही ज़्यादा खुश हूँ। " #

# पाठकों की सुविधा और निरँतरता बनाए रखने के लिए यह पँक्तियाँ पहले जोड़ दी गई हैं।

आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

जय साईं राम

ॐ साईं राम


पालेकर खापर्डे से भुसावल में मिले और दोनों ने नागपुर जाने वाली रेल से यात्रा की। खापर्डे १६ मार्च को अमरावती पहँचे। उनका हृदय तो शिरडी में ही रह गया था, जैसा कि उनकी १८ मार्च १९१२ को लिखी गई प्रविष्टि से पता चलता है॰॰॰॰॰॰॰

" यहाँ शिरडी जैसा आध्यात्मिक वातावरण नहीं है और मैं अपने आप को अत्याधिक कष्ट में महसूस कर रहा हूँ बावजूद इसके कि हमसा मेरे साथ एक छत के नीचे हैं और उनका प्रभामँडल बहुत शक्तिशाली है। मैं वैसे ही उठना चाहता हूँ जैसे कि शिरडी में उठता था, पर नहीं उठ पाया और सूर्योदय से पूर्व मेरी प्रार्थना पूरी करने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी। " #

# पाठकों की सुविधा के लिए और निरँतरता को बनाए रखने के लिए यह पँक्तियाँ पहले जोड़ कर लिख दी गई हैं।

आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

जय साईं राम

ॐ साईं राम


इस समयावधि की डायरी में जो कि १९२४-१९२५ में श्री साईं लीला में प्रकाशित हुई थी, उसके कुछ उद्धरण हैं जो कुछ मायने में अधूरे हैं, और कुछ तो बिल्कुल छूट गए हैं। आइए देखते हैं कि यह उद्धरण कौन से हैं।


८ दिसँबर १९११ की प्रविष्टि में से ये पँक्तियाँ छूट गई है॰॰॰॰॰॰॰॰


" माधवराव देशपाँडे यहाँ हैं और वह सो गए। मैंने जो अपनी स्वयँ की आँखो से देखा और जो अपने कानों से सुना, वह केवल पढ़ा था, कभी अनुभव नहीं किया था॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰माधवराव देशपाँडे की हर आती जाती साँस के साथ ' साईं नाथ महाराज', ' साईं नाथ महाराज ' की स्प्ष्ट ध्वनि सुनाई दे रही थी।॰॰॰॰॰॰॰यह ध्वनि जितनी स्पष्ट हो सकती थी, उतनी थी और माधवराव देशपाँडे के खर्राटों के साथ , दूरी से भी यह शब्द सुने जा सकते थे। यह सचमुच अद्भुत है। "


१२ से १५ मार्च १९१२ तक की प्रविष्टियाँ-

निम्नलिखित पँक्तियाँ १२ और १३ मार्च १९१२ की हैं और मराठी में लिखित जीवनी से अँग्रेज़ी में रुपाँतरित की गई-

१२ मार्च १९१२ की प्रविष्टि-

" हमने अपनी पँचदशी की सँगत की और आज के कार्य सम्पन्न किए। पुस्तक सम्पूर्ण करने के उपलक्ष्य में हमने दो अनार खाए। "#

" बाबा पालेकर नाना साहेब के साथ आए। वह अमरावती से आए हैं और मेरे साथ ठहरे हैं। मैं स्वाभाविक रूप से उनके साथ बैठ कर बात करने लगा। मेरे लोग काफी तँगी में हैं। "#
१३ मार्च १९१२ की प्रविष्टि-

" बाबा पालेकर को मुझे कल या परसों ले जाने की अनुमति प्राप्त हो गई। "#

१४ और १५ मार्च १९१२ की प्रविष्टियाँ श्री साईं लीला में प्रकाशित डायरी में से बिल्कुल अनुपस्थित थीं। यह पँक्तियाँ मराठी भाषा में लिखित जीवनी से ली गई हैं और अँग्रेज़ी में रूपाँतरित की गई है।

# पाठकों की सुविधा के लिए और निरँतरता को बनाए रखने के लिए यह पँक्तियाँ पहले जोड़ कर लिख दी गई हैं।

आगे जारी रहेगा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰�� �॰॰

जय साईं राम
ॐ साईं राम

२९ दिसँबर १९११ की शिरडी डायरी की पाद टिप्पणी में, जो कि बाद में जोड़ी गई थी, यह लिखा गया-

" 'हमसा' ने यह सब मुझे तब बताया जब वह हमारे मेहमान थे। बाद में वह सब झूठ सिद्ध हुआ। वह कभी मान सरोवर या हिमालय पर गए ही नहीं थे, और बाद में बुरे चरित्र के साबित हुए। गजानन पुरोहित उनके सह अपराधी थे और असल में दोनों ही पुलिस के जासूस थे। "

१४ जून १९१३ की उनकी प्रविष्टि में दादा साहेब ने लिखा है ( साईं लीला में यह प्रविष्टि नहीं दी गई है )-

" हमसा ने बहुत से लोगों को साधु बन कर ठगा है। "

यह भी महत्वपूर्ण है कि २९ दिसँबर १९११ की प्रविष्टि में जो 'ऊदी' के बारे में और त्रिशूल से गवर्नर को मार भगाने की जो टिप्पणियाँ मिलती हैं, उस समय हमसा शिरडी में ही थे। कोई आश्चर्य नहीं है कि साईं बाबा को हमसा के षडयँत्र के बारे में पता था और उन्होंने अपने विश्वसनीय भक्त पर आए किसी भी खतरे को दूर भगाने के लिए उन्होंने अपनी शक्तियों का प्रयोग किया।


जय साईं राम