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Saturday, May 12, 2012

ॐ साईं राम

२८ फरवरी, बुधवार, १९१२-


मैं काँकड आरती में सम्मिलित हुआ और वापिस आने पर प्रार्थना कर ही रहा था कि ढोंढे बाबा पूना से आ गए। वह अभी अभी बर्मा से लौटे हैं और मैंनें उनसे अपने मित्र तिलक की तबीयत और उनकी मनःस्थिति के बारे में पूछा। वो वैसी ही है जैसी कि इन हालातों में हो सकती है। वह चाहते हैं कि मैं अदालत में अपनी वकालत पुनः शुरू करूँ, किन्तु सब कुछ साईं साहेब के आदेश पर निर्भर करता है।


हमने पँचदशी के पाठ की सँगत की और श्रीमान भाटे उसमें सम्मिलित हुए। हमने साईं साहेब के बाहर जाते हुए और जब वह मस्जिद में लौटे तब दर्शन किए। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या जीवामुनि मूल्य चुकाएगा? मैं समझ नहीं सका कि जीवामुनि का क्या अर्थ है, किन्तु मैंने उत्तर दिया कि अगर आदेश दिया जाए तो वह चुकाएगा। उन्होंने मुझे बहुत से फल और मिठाईयाँ दी।


दोपहर की आरती रोज़ाना की तरह सम्पन्न हुई। आज एकादशी थी, और मेरे और रघुनाथ के सिवा किसी ने नाश्ता या दोपहर का भोजन नहीं किया। ढोंढे बाबा ने भी व्रत रखा। वह लगभग ४ बजे शाम को दादा केलकर के पुत्र भाऊ के साथ पूना चले गए। उसके बाद हमने पँचदशी के पाठ की सँगत की, और शाम को साईं महाराज की सैर के समय उनके दर्शन किए। वे अत्यँत प्रसन्नचित्त थे , धीमे से चल रहे थे, और हँसी कर रहे थे। वाड़ा आरती के बाद भीष्म ने भागवत और दासबोध का पठन किया।


जय साईं राम