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Tuesday, April 10, 2012

ॐ साईं राम


१३ जनवरी १९१२-


मैं सुबह जल्दी उठा और काँकड आरती में सम्मिलित हुआ। आज साईं महाराज ने एक शब्द भी नहीं कहा और ना ही उस दृष्टि से सब को निहारा जैसे प्रतिदिन वे हमें देखते हैं। आज खाँडवा के तहसीलदार यहाँ आए हैँ। हमने उन्हें तब देखा जब वे रँगनाथ की योगवशिष्ठ पढ रहे थे। हमने साईं महाराज के बाहर जाते हुए और जब वे वापिस लौटे तब दर्शन किए। कल जिन बालिकाओं ने भजन गाए थे वे आज भी आईं थीं। उन्होंने कुछ देर गाया, प्रसाद लिया और चली गईं।


दोपहर की आरती सुखद रूप से सम्पन्न हुई। मेघा की तबियत अभी भी ठीक नहीं है। माधवराव देशपाँडे के भाई बापाजी को सपत्नीक नाशते के लिए बुलाया था। खाँडवा के तहसीलदार अत्यंत सज्जन हैं, उन्होंने योगवशिष्ठ पढी। उन्होंने कहा कि उनकी धार्मिक प्रवृतियों के कारण अनेक लोगों ने उन्हें अनेक दुख दिए थे। दोपहर को कुछ देर आराम करने के बाद दीक्षित ने भावार्थ रामायण का ११वाँ अध्याय (बालकाण्ड) पढा जो योग वशिष्ठ का ही साराँश है तथा अति रोचक है। हमने साईं महाराज के उस समय फिर से दर्शन किए जब वे घूमने जा रहे थे। उनका स्वभाव बदला हुआ लगा, ऐसा प्रतीत हुआ कि वे नाराज़ हैं पर असल में वे रूष्ट नहीं थे। रात को रोज़ की भाँति भजन और रामायण का पाठ हुआ।


जय साईं राम