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Tuesday, April 10, 2012

ॐ साईं राम


१७ जनवरी १९१२-


मैं प्रातः बहुत जल्दी उठा और बापू साहेब जोग को स्नान के लिए बाहर जाते हुए देखा। तब तक मैंने प्रार्थना पूर्ण की। काँकड आरती के लिए हम चावडी गए। मेघा अत्यँत रूग्ण होने के कारण आरती करने के लिए नहीं आ पाया अतः बापू साहेब जोग ने आरती की। साईं महाराज ने श्री मुख ऊपर उठाया और अत्यँत दयापूर्वक मुस्कुराए। उस मुस्कुराहट की एक झलक पाने के लिए यदि यहाँ वर्षों तक भी रुकना पडे तो भी वह कम है। मैं अत्याधिक हर्षित हो दीवानों की तरह उन्हें निहारता रहा।

जब हम वापिस लौटे तो नारायणराव के पुत्र गोविन्द और भ्राता भाऊ बैलगाडी पर सवार हो कर कोपरगाँव होते हुए होशँगाबाद गए। तब मैंने अपनी दिनचर्या के कार्य पूर्ण किए। मैंने कुछ पँक्तियां लिखी और बापू साहेब जोग तथा उपासनी के साथ 'परमामृत' का पठन किया। हमने साईं महाराज के बाहर जाते हुए और फिर मस्जिद में लौटते हुए दर्शन किए। साईं महाराज ने मेरी ओर देख कर कुछ मूक निर्देश दिए किन्तु मैं एक मूर्ख की भाँति कुछ समझ नहीं सका।


वाडे में लौटने पर मैंने स्वँय को बिना किसी कारण से निराशाजनक रूप से उदास महसूस किया। बलवन्त भी उदास लग रहा था , उसने कहा कि वह शिरडी से जाना चाहता है। मैंने उसे साईं महाराज की अनुमति लेने के बाद ही कोई निर्णय लेने को कहा। भोजन करने के बाद मैं कुछ देर लेटा। मेरी इच्छा हुई कि मैं दीक्षित से रामायण सुनूं, किन्तु साईं महाराज ने उन्हें बुला भेजा और उन्हें जाना पडा।


खाँडवा के तहसीलदार साहेब श्री प्रह्लाद अम्बादास ने आज जाने की अनुमति माँगी जो उन्हें मिली। वहाँ जलगाँव के श्री पाटे और उनके साथ लिंगायत भी हैं। वे दोनो शायद कल जायेंगे। हमने साईं महाराज के शाम की सैर के समय दर्शन किए। वे बहुत प्रसन्न दिख रहे थे। रात को रोज़ की भाँति भीष्म के भजन और दीक्षित की रामायण हुई। रात को वाडे की आरती के समय मुझे सुबह साईं महाराज द्वारा दिए गए मूक निर्देशों का अर्थ समझ में आया अतः मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।


जय साईं राम